दीदी के पश्चिम बंगाल में आखिर कब थमेगा राजनितिक संघर्ष?

आम चुनावों में जो गर्द उडी थी, लगता है अब थम सी गई है, लेकिन प.बंगाल को छोड़कर। डॉक्टरों के प्रदर्शन के माध्यम से सांप्रदायिकीकरण का दौर वापिस आ गया है। हिंदू डॉक्टर मुसलमान मरीजों का इलाज करने से इंकार कर रहे हैं।

दीदी के पश्चिम बंगाल में आखिर कब थमेगा राजनितिक संघर्ष?
cm of west bengal - Mamata Banergy

राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की जो दुर्गति हुई, बंगाल स्तर पर वही दुर्गति तृणमूल को झेलनी पड़ी. ममता ने मुसलमान धाíमक तत्वों को जो वजीफे दिए, मुहर्रम जैसे त्यौहारों को जो प्राथमिकता दी गई, उनकी गहरी प्रतिक्रिया हुई और भाजपा हिंदू जनता के ध्रुवीकरण में कामयाब रही.

लोकसभा चुनावों में जो गर्द उड़ी, वह पूरे देश में शांत हो गई है, पर प.बंगाल में नहीं. डॉक्टरों के आंदोलन के जरिये सार्वजनिक जीवन के सांप्रदायिकीकरण का नया दौर चल निकला है. हिंदू डॉक्टर घोषित रूप से मुसलमान मरीजों का इलाज करने से इंकार कर रहे हैं. इसके उत्तर में ममता द्वारा बंगालीवाद का तूफान उठाने की कोशिश की जा रही है. अगर वे अपने इस इरादे में कामयाब हो गईं तो भाजपा को हिंदी भाषियों की पार्टी के रूप में दिखाया जा सकेगा. 

यह भाजपा की परीक्षा है, क्योंकि प्रधानमंत्री वहां हिंदी में ही भाषण देते हैं. तमिलनाडु में भाजपा को इसी रूप में देखा जाता है, और इसी डर से मोदी वहां अंग्रेजी में लिखा भाषण पढ़ते हैं. लेकिन, दक्षिण और पूर्व की स्थितियों में अंतर है. उत्तर-पूर्व में भाजपा अपना झंडा गाड़ चुकी है. उसने असम और त्रिपुरा को जीत कर दिखा दिया है कि पूर्व के भारतवासियों को भाजपा के हिंदी-प्रेम से कोई दिक्कत नहीं है. कुल मिला कर 2021 का संघर्ष भाजपा की अखिल भारतीय हिंदीप्रधान बहुसंख्यकवादी राजनीति और ममता द्वारा उठाए गए बांग्ला क्षेत्रीय अस्मिता के झंडे के बीच होना तय लग रहा है. 

यहीं एक सवाल और है. क्या भाजपा कानून और व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति का सहारा ले ममता बनर्जी की सरकार बर्खास्त करने की हद तक जा सकती है? अगर मोदी ने ऐसा किया तो यह एक दुधारा कदम  साबित हो सकता है. राज्यपाल शासन में ममता के समर्थकों का एक बड़ा हिस्सा भाजपा की तरफ जा कर तृणमूल को बेहद कमजोर कर सकता है, और दूसरी तरफ यह भी हो सकता है कि जिस विपक्षी स्पेस का लाभ आज भाजपा को मिल रहा है, वह ममता को मिलने लग सकता है. राज्यपाल शासन में भाजपा सत्तारूढ़ पार्टी होगी और तृणमूल विपक्षी. और, ममता से ज्यादा विपक्षी राजनीति में कुशल और कौन है?

हाल ही में हुई एक टीवी-बहस में मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के एक प्रवक्ता मुझसे इसलिए नाराज हो गए कि मैंने उन्हें पश्चिम बंगाल में उनकी पार्टी की चुनावी मुहिम के उस नारे की याद दिला दी जो खुले तौर पर नहीं बल्कि खुफिया तौर पर लगाया जा रहा था. यह नारा मार्क्‍सवादियों की गोपनीय रणनीति की सटीक अभिव्यक्ति थी. यह था : उन्नीशे हाफ और इक्कीशे साफ. यानी 2019 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की सीटें आधी कर देनी हैं, ताकि 2021 के विधानसभा चुनाव में उसे पूरी तरह से पराजित किया जा सके. लेकिन अगर तृणमूल हारेगी तो कौन जीतेगा? 

इसमें किसी को शक नहीं था कि 2019 में जीत मार्क्‍सवादियों को नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी को मिलने वाली थी. इस गोपनीय रणनीति के तहत स्थानीय स्तर पर मार्क्‍सवादियों ने अपने वोटों को भाजपा की तरफ हस्तांतरित करने की योजना पर अमल किया, इस उम्मीद में कि दो साल बाद विधानसभा चुनावों में वे अपने वोटों को फिर से वापस प्राप्त कर लेंगे. कई जगहों पर तो भाजपा और माकपा के झंडे तक एक साथ लगे. 

खास बात यह है कि वोटों के इधर से उधर जाने की यह प्रक्रिया सात चरणों में हुए चुनाव में पहले चरण से ही शुरू हो गई थी. भाजपा की राजनीति और मोदी की शख्सियत के प्रति बंगाल के लोगों में आकर्षण तो पहले से ही था, माकपा के इस रणनीतिक वोट-ट्रांसफर ने उसे पहले-दूसरे चरण की सभी सीटें जीतने का मौका दे दिया. 

ममता को यह भांपने में कुछ देर लगी. फिर वे संभलीं और हम जानते हैं कि बाकी पांच चरणों में ज्यादातर परिणाम उनकी पार्टी के पक्ष में गए. यहां तक कि आखिरी चरण की नौ सीटों (जो विद्यासागर की प्रतिमा के तोड़े जाने के कारण सर्वाधिक विवादास्पद रहा) में सभी तृणमूल ने ही जीतीं. बाद के चरणों में जो रणनीतिक कुशलता, जुझारू राजनीति और मेहनत ममता ने दिखाई, उसी का परिणाम है कि बारह सीटें कम जीतने के बावजूद उनके वोटों का हिस्सा बढ़ गया. 

आखिरकार ममता बनर्जी कांग्रेस के राजनीतिक स्कूल की छात्र रही हैं. उन्होंेने देखा है कि कांग्रेस किस तरह से हिंदू व मुसलमान सांप्रदायिकताओं की समय-समय पर पीठ ठोंक कर दोतरफा तुष्टिकरण की नीति पर अमल करती रही है. कांग्रेस की कथित धर्मनिरपेक्षता यही थी. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की जो दुर्गति हुई, बंगाल स्तर पर वही दुर्गति तृणमूल को ङोलनी पड़ी. 

ममता ने मुसलमान धाíमक तत्वों को जो वजीफे दिए, मुहर्रम जैसे त्यौहारों को जो प्राथमिकता दी गई, उनकी गहरी प्रतिक्रिया हुई और भाजपा उसके जरिये हिंदू जनता के ध्रुवीकरण में कामयाब रही. मोदी ने अपने भाषणों में सावधानीपूर्वक बहुसंख्यकवादी भाषा और दलीलों का इस्तेमाल किया जिसमें स्पष्ट तो नहीं पर कहीं दबा और कहीं खुला मुसलमान विरोध शामिल था. 

ममता के पास इसके प्रतिकार के लिए कोई कारगर रणनीति नहीं थी. वे प्रतिक्रियास्वरूप अपने हर भाषण के अंत में चंडी-श्लोकों का पाठ करने लगीं. इससे उन्हें कुछ लाभ हुआ होगा, पर उतना नहीं जितनी उन्हें उम्मीद थी.